देश के पास आज भी फुटबॉल स्टेडियम नहीं, 75 से ज्यादा मैदान मल्टीपर्पज, जानें फुटबॉल में क्यों पिछड़ रहा भारत?
punjabkesari.in Friday, Jul 10, 2026 - 01:04 PM (IST)
स्पोर्ट्स डेस्क : दिसंबर 2025 कोलकाता के साल्ट लेक स्टेडियम में जब दिग्गज फुटबॉलर लियोनेल मेसी को आमंत्रित किया गया तो करीब 35 हजार लोग उन्हें देखने आए। मेसी की एक झलक भी नसीब नहीं हुई। नेताओं, सेलिब्रिटीज और उनके बाउंसरों की फौज के घिरे मेसी को करीब 15 मिनट में ही बाहर निकालना पड़ा। इतिहास का सबसे बड़ा 48 मुल्कों का फीफा विश्व कप टूर्नामेंट टीवी पर देख रहे हैं। हर चार साल वही घिसा-पिटा सवाल, इतनी बड़ी आबादी से ग्यारह ढंग के खिलाड़ी क्यों नहीं निकलते?
ठीकरा दशकों से संस्कृति, जीन और क्रिकेट-प्रेम पर फूटता रहा है। यहां मेरी असहमति है। जवाब जज्बे में नहीं, एक स्प्रेडशीट में छिपा है। जोश और पैसा दोनों कोलकाता में थे, बस बहाव गलत दिशा में था। भारत की नाकामी टैलेंट का अकाल नहीं, अर्थशास्त्र का अकाल है। ढांचा गौर से देखिए। शिखर पर BCCI, 20,000 करोड़ रुपए का दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड। तलहटी में 1.5 अरब ख्वाब, गली में पंचर फुटबॉल ड्रिबल करते बच्चे, जंगलों में हाथ का बना धनुष तानते किशोर। और इन दोनों के बीच एक चौड़ी, वीरान खाई।
हर सेहतमंद अर्थव्यवस्था की रीढ़ उसका मध्यम वर्ग होता है, उसके MSME होते हैं लेकिन भारत की खेल अर्थव्यवस्था में ऐसा कुछ है ही नहीं। यह खाई कागजी नहीं, इसके चेहरे हैं। दिग्गज फुटबॉलर बाइचुंग भूटिया ने मुझे बताया था कि पूर्वोत्तर के 15 साल के बच्चे हर सीजन खेल छोड़ देते हैं। वजह? टैलेंट नहीं। अगले ट्रायल तक का बस का किराया और जूतों का बिल। कुछ दिन बाद स्वर्गीय जसपाल राणा के पिता 1971 के युद्ध-नायक और उत्तराखंड के पहले खेल मंत्री नारायण सिंह राणा ने वही बात दूसरे लहजे में दोहराई, 'कच्चा हुनर उभरता है, तंत्र नहीं मिलता और वह चुपचाप किसी शहर के ढाबे में टेबल पोंछने चला जाता है।'
यानी कमी खिलाड़ियों की नहीं, उन संस्थानों की है जो एक खिलाड़ी को करियर में तब्दील करते हैं। तिरुपुर की कपड़ा फैक्टरी को सस्ता कर्ज, टैक्स छूट और नीतिगत लाड़-प्यार मिलता है। और वह खेल अकादमी, जो कपड़े की जगह कौशल बेचती है, उसे क्या मिलता है? क्षेत्रीय लीगें फैस की कमी से नहीं मरती, बल्कि टिकाऊ आमदनी के मॉडल की गैरमौजूदगी में दम तोड़ती हैं।
एक और कड़वा सच, इस देश के पास आज तक एक भी बड़ा, पूरी तरह फुटबॉल ही को समर्पित, आधुनिक फीफा मानकों वाला स्टेडियम नहीं है। 75 से ज्यादा स्टेडियम है, मगर सभी मल्टीपर्पज। यानी ज्यादातर बड़े मैदानों के गिर्द एथलेटिक्स ट्रैक हैं और दर्शक खेल से बीस मीटर दूर बैठे होते हैं। यह टैलेंट का नहीं, निवेश का फासला है। तो इलाज ? कोई रॉकेट साइंस नहीं। वही पुराना, आजमाया हुआ अर्थशास्त्र। सबसे पहले खेल अकादमियों को MSME का दर्जा दीजिए। वही कर्ज, छूट और संरक्षण जो नोएडा और गुरुग्राम के कारखानों को मिलता है। साथ ही, बच्चों के फुटबॉल जूतों पर लग्जरी दर से GST वसूलना बंद हो।
जूता विलासिता नहीं, औजार है। फिर पैसे की दिशा मोड़िए। कंपनियों के कुल खेल CSR बजट का कम-से-कम 50 फीसदी हिस्सा सीधे टियर-2 और टियर-3 अकादमियों तक पहुंचना चाहिए, न कि महानगरों की चमकदार स्पॉसरशिप में। और तीसरा, केंद्र, राज्य और कॉर्पोरेट मिलकर सौ जिला स्तरीय, सार्वजनिक ऑडिट वाले फुटबॉल केंद्र खड़े करें। हर बड़े अंतरराष्ट्रीय दौरे में 'ग्रासरूट गारंटी' अनिवार्य हो। गरिमा अगर कानून से लागू नहीं हो सकती, तो 'सेल्फी' को महंगा तो बनाया से जा सकता है। अर्थव्यवस्थाएं कल्पना और इत्तेफाक मार्केट लीडर नहीं बनतीं और न ही देश किस्मत से विश्व कप टीमें बनाते हैं।
दोनों एक ही तरीके से बनते हैं- नीचे से ऊपर, पूंजी और सब्र के साथ। जब तक यह बात हमारी समझ में नहीं आती, दुनिया का सबसे बड़ा देश वही बना रहेगा जो उस दिसंबर की दोपहर साल्ट लेक में था, या आज टीवी पर फीफा देखते हुए है- किसी और देश की टीम और खिलाड़ियों का सपना लिए 1.5 अरब स्थायी दर्शक।

